“मृत्यु दिवस” सिर्फ एक तारीख नहीं है – यह एक ऐसा पड़ाव है जो हमें अपने अस्तित्व की नाजुकी और रिश्तों की गहराई दोनों का एहसास कराता है। 🔹 भावनात्मक पहलू जिस दिन कोई अपना इस दुनिया से जाता है, वह दिन हर साल दोहरा दर्द लेकर आता है। परिवार में श्राद्ध, तर्पण, पिंडदान जैसी रस्में निभाई जाती हैं। ये रस्में सिर्फ धार्मिक नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक रिलीज का माध्यम भी हैं। जब आप पितरों को जल देते हैं, तो मन में यह संतोष होता है कि उनकी आत्मा को शांति मिल रही है। 🔹 सामाजिक परिप्रेक्ष्य गांवों और छोटे शहरों में मृत्यु दिवस पर भोज, दान-पुण्य और ब्राह्मण भोज का आयोजन होता है। लेकिन आलोचनात्मक दृष्टि से देखें तो कई बार यह रस्में दिखावे का रूप ले लेती हैं – कितना पैसा खर्च किया, कितने लोग आए, कितने ब्राह्मणों को दान दिया? क्या मृतक की आत्मा को वास्तव में पैसे या भोज की भूख है? या फिर हम अपने दुख को इन रस्मों के पीछे छिपाते हैं? 🔹 दार्शनिक दृष्टि गीता के अनुसार, आत्मा अमर है – जो पैदा हुआ है वह मरेगा और मरने के बाद फिर जन्म लेगा। फिर मृत्यु दिवस मनाने का क्या अर्थ? असल में, यह दिन हमें यह याद दिलाने के लिए है कि जीवन क्षणभंगुर है। एक रोचक तथ्य: कई आधुनिक विचारक “मृत्यु दिवस” को “जीवन उत्सव” (Life Celebration Day) में बदलने की सलाह देते हैं – दुखी होने के बजाय मृतक की याद में कुछ अच्छा करें, कोई गरीब बच्ची की पढ़ाई का खर्च उठाएं, कोई पेड़ लगाएं। 🔹 आलोचनात्मक मूल्यांकन हिंदी सिनेमा और साहित्य में “मृत्यु दिवस” पर कुछ बेहतरीन रचनाएँ मिलती हैं। फिल्म ‘मासान’ और ‘पीकू’ में मृत्यु और अंतिम संस्कार की रस्मों पर कसीदे कसते दृश्य हैं। कवि निराला की “सरोज स्मृति” और दूबे जी के व्यंग्य उस पाखंड को उजागर करते हैं जो इन दिनों से जुड़ा है। 🔹 निष्कर्ष – क्या बदलना चाहिए? मृत्यु दिवस का सही अर्थ है – “अपनों को याद करना” , न कि केवल रस्मों को निभाना। अगर इस दिन हम मृतक के पसंदीदा काम को करें, उसकी सीख को जीएँ, और ज़रूरतमंदों की मदद करें – तो शायद वह दिन उतना दर्दनाक न रहे। मृत्यु दिवस को “जीवन दिवस” बनाने की जरूरत है। “मृत्यु दिवस वह दिन है जब जीवन हमसे सवाल करता है – क्या तुमने सच में जीया?” — समीक्षक: एक आम इंसान जिसने अपनों को खोया है